महाशिवरात्रि

Lutru Mahadev

हर हर महादेव, जय लुटरु महादेव के जयकारों के साथ हर वर्ष महाशिवरात्रि उत्सव पर लुटरु महादेव गुफा में भक्तों का लगता है तांता ।
अर्की शालाघाट मार्ग से एक किमी की दूरी पर स्थित है लूटरु महादेव की गुफा ।
61 फिट लंबी तथा 31 फीट चौड़ी है यह गुफा।

( बाघल टाईम्स )
हिमाचल प्रदेश के जिला सोलन के अर्की में बहुत सी शिव गुफाएं हैं और इन सभी गुफाओं में स्वयंभू शिवलिंग भी विद्यमान है ।
पहाड़ी भाषा लटूरी (लटा ) से निकला शब्द लुटरु यानी शिव की लटाओं वाले आकार के समान लुटरु महादेव गुफा अर्की मुख्यालय से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर है ।इस गुफा के लिए सड़क मुख्य मार्ग (नागरिक चिकित्सालय) से जाती है जिसकी यंहा से करीब 1 किलोमीटर की दूरी है। शहर की सबसे ऊंची पहाड़ी पर बनी इस गुफा तक पहुंचने के लिए गाड़ी या पैदल पगडंडियों से होते हुए भी पहुँच सकते है।
हालांकि स्थानीय प्रशासन व निकाय द्वारा यंहा पक्की सडक बनाई गई है तथा पैदल चलने वाले लोगों के लिए सड़क मार्ग पर वर्षाशालिका भी बनाई गई है। साथ ही यहाँ पार्किंग तथा शौचालयों की भी उचित व्यवस्था की गई है ।
पार्किंग से करीब 60 मीटर की दूरी पर लुटरु महादेव का मुख्य द्वार है जहां से करीब 150 से ज्यादा सीढ़ियां गुफा में बने स्वयंभू शिवलिंग तक पहुंचती है। पहुंचने के पश्चात स्वयंभू शिवलिंग के दरबार के एकदम दांई ओर करीब 20 मीटर की ऊंचाई पर लगभग 6 मीटर गोलाकार का एक छिद्र (छेद) बना है जिससे सूरज की किरणें स्वयंभू शिवलिंग तक पहुंचती है।पश्चात स्वयंभू शिवलिंग बहुत ही सुंदर व मनमोहक लगते है जिसे देखने लोग दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं ।
शिवलिंग के ऊपर विशाल काया चट्टान है जिसमें गाय के आकार के थन बने हैं इन थनो से कई बार पानी भी टपकता रहता है। 11मीटर चौड़ी तथा 61 मीटर लंबी इस गुफा के अंदर का दृश्य ऐसा लगता है मानो शिव की लटाओं के आप साक्षात दर्शन कर रहे हों। गुफा के अंदर हर समय धूना लगा रहता है जो सदियों से निरंतर चला आ रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सतयुग में स्वयंभू शिवलिंग पर गिरने वाले पानी के बदले कभी दूध निकला करता था । बताया जाता है कि एक गडरिया इस पहाड़ी पर भेड़े चरा रहा था तथा गुफा नज़र आने के बाद अंदर चला गया। शिवलिंग के दर्शन करने के पश्चात उसने शिवलिंग के ऊपर बने थनों को छू लिया। देखते ही देखते दूध निकलना बंद हो गया तथा उसके बाद पानी गिरना शुरू हो गया।
मौजूदा समय की यदि हम बात करें तो सावन सक्रांति से भादो सक्रांति के बीच आज भी दूध जैसे रंग का पानी यहाँ गिरता है।
महाशिवरात्रि के उत्सव पर लोग दूर-दूर से आते हैं तथा दूध जल का अभिषेक कर व बिलपत्र आदि चढ़ाकर भगवान शिव शंकर का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

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